गुरुवार, दिसंबर 27

'ग़ज़ल' 41 सारा आलम चनाब लिखने लगा

एक   दीवाना   आब  लिखने   लगा।
सारा  आलम  चनाब   लिखने लगा।

मैंने  लिक्खे  थे  कुछ  सुकून के पल,
और   वो  इज़्तिराब   लिखने   लगा।

एक    भँवरे    से   दोस्ती   के   बाद,
मैं  भी  केवल  गुलाब  लिखने  लगा।

ज़ुल्मत-ए-शब   तो   बढ़  गई   होती,
पर   कोई   आफ़ताब  लिखने  लगा।

मैंने  भी  उसका  सब  हिसाब  किया,
वो भी फिर से  हिसाब  लिखने लगा।

थी   रसाई   न   जाम-ओ-मीना  तक,
आब   को  ही   शराब  लिखने  लगा।

मैं    हक़ीक़त   हूँ,  जानता   है   मगर,
जाने क्यों  ख़ाब-ख़ाब  लिखने लगा।

मुझको कल तक जो जान कहता था,
मुझको  'ख़ाना ख़राब' लिखने  लगा।

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दश्त    में   दरिया   आब   में   सहरा,
कुछ  अलग ही हिसाब लिखने लगा।

धूप    से   राबिता    है   बारिश   का,
और   सूरज   सराब   लिखने   लगा।_

वो  जो  केवल  मेरा  ही  था  'रौनक़',
वो  भी  अब  इंतिसाब  लिखने लगा।

- 'रोहित-रौनक़'

रविवार, दिसंबर 9

'ग़ज़ल' 40 कोई कमी थी मेरे हाल-ए-दिल सुनाने में।

कोई  कमी   थी   मेरे   हाल-ए-दिल  सुनाने   में।
वगरना   कम  तो  न थे  रहम   दिल  ज़माने  में।

बस   एक   बार  कहा  उसने   मुझको  संजीदा,
फिर    उसके   बाद   लगी   उम्र   मुस्कराने   में।

वो  जिनके  लम्स से   जाम-ओ-सुबू चहक  उट्ठे,
ये   कौन  लोग   हैं   आख़िर   शराब   खाने   में।

तुम्हारी  यादों   से   शिकवा   रहेगा  आँखों  को,
इन्ही    का    हाथ    है   रातें   बड़ी   बनाने   में।

सदायें   आज   भी    आती  हैं   आसमानों   से,
परिंदा  आज  भी  उलझा  है  आब-ओ-दाने में।

लगाव   दुनिया   का   बेजान   चीज़ों   से   देखो,
लगे   हैं  लोग   ख़ुदा   को   भी  बुत   बनाने   में।

चराग़-ए-ख़ाहिश-ए-दिल  तो  जला  लिया लेकिन,
धुआँ-धुआँ    हुए    'रौनक़'    धुआँ    छुपाने   में। 

- 'रोहित-रौनक़'

बुधवार, अक्टूबर 3

'ग़ज़ल' 39 इश्क़ अजब है, तोहमत लेकर आया हूँ

इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।
और  लगता  है , शुहरत  लेकर  आया हूँ।

बदहाली   में   भी   सालिम   ईमान  रहा,
मैं  दोज़ख़  से   जन्नत   लेकर   आया  हूँ।

मिट्टी,  पानी,   कूज़ागर   की   फ़नकारी,
और  इक  धुंधली  सूरत  लेकर  आया हूँ।

कितने रिश्ते, कितने नुस्ख़े, कितना प्यार,
मैं   दादी  की   वसीयत  लेकर  आया  हूँ।

आज 'गली क़ासिम'  से होकर गुज़रा था,
साथ  में   थोड़ी  जन्नत   लेकर  आया  हूँ।

अब 'रौनक़' की बात न करना महफ़िल में,
उसके   दर  से   हिजरत   लेकर  आया हूँ।

- 'रोहित-रौनक़'

सोमवार, सितंबर 10

'ग़ज़ल' 38 तुम्हारे ख़ाबों की मीनार गिर भी सकती है।

अगर  रहे  न  ख़बरदार, गिर  भी  सकती  है।
तुम्हारे  ख़ाबों  की मीनार  गिर भी सकती है।

जुनून-ए-जंग  की  वहशत  में  ये  ख़याल रहे,

तुम्हारे  हाथ  से  तलवार  गिर  भी सकती है।

अभी  किया  है  समुन्दर  ने नाख़ुदा से क़रार,

समझ  गया हूँ कि पतवार गिर भी सकती है।

हमारे    बीच    कोई    गुफ़्तगू    नहीं   होती,

तो क्या ये बीच की दीवार गिर भी सकती है।

हमारा  माल  भी  बिक  जाएगा  ज़रा  ठहरो,

ख़बर है क़ीमत-ए-बाज़ार गिर भी सकती है।

हूँ   ख़ाकसार  प  इतना  ख़याल  है  मुझको,

ज़ियादा  झुकने से दस्तार गिर भी सकती है।

- 'रोहित-रौनक़'

बुधवार, अगस्त 22

'ग़ज़ल' 37 मैं फ़सानो में दर्ज हो जाता

मैं   फ़सानो    में   दर्ज   हो   जाता।
तो   किताबों   में  दर्ज   हो   जाता।

मुझसे  तो था निज़ाम-ए-नौ बनना,
क्यों   रवाजों   में   दर्ज   हो  जाता।

शिद्दत-ए-प्यास   गर   मुक़द्दर   थी,
मैं    सराबों   में    दर्ज   हो   जाता।

गर निकलता सुकूत-ए-ज़ेहन से मै,
दिल  के  नालों  में  दर्ज  हो  जाता।

दर्द   से    राबिता    न    होता   तो,
वाहवाहों    में    दर्ज    हो    जाता।

काश  इक  दिन  मेरा  मुक़दमा भी,
तेरी   बाहों    में   दर्ज   हो   जाता।

- 'रोहित-रौनक़'

शुक्रवार, अगस्त 17

'ग़ज़ल 36' इक दिया दहलीज़ पर हम ने जला रहने दिया

ज़ुलमत-ए-शब   में  उजालों  का  पता   रहने  दिया।
इक  दिया  दहलीज़  पर  हम  ने  जला  रहने  दिया।

वक़्त  की  गर्दिश  से  लम्हों  की  हिफ़ाज़त के लिए,

आपका   इक   फूल   पन्नों   में   दबा   रहने   दिया।

सोचा   उसको   बेवफ़ा   के  फ़ोल्डर  में   डाल   दूँ,

अक़्ल  की  मन  ने  कहां   मानी  भला,  रहने दिया।

जान  कर   हमने   कि   कोई  और   होगा  चारागर,

आज तक इस ज़ख्म-ए-दिल को बे-दवा रहने दिया।

वो भी मुझको  जान ले, और मैं भी उस को देख लूँ,

सो   हमारे   दरमियाँ   इक    आईना  रहने    दिया।

जानता   था    तीरगी    का   बदइरादा   'रोहिताश्व',

इसलिए   ही  जुगनुओं  को   जागता   रहने  दिया।

- 'रोहित-रौनक़'

मंगलवार, अगस्त 7

"ग़ज़ल" 35 वो जिस अदब से क़रीब आए, मुझे यक़ीं था कि लूट लेंगे

अँधेरी   शब में  दिए  बुझाए,  मुझे  यक़ीं  था  कि लूट लेंगे।
वो  जिस अदब से क़रीब आए, मुझे  यक़ीं था कि लूट लेंगे।

बहुत ही डरती झिझकती नज़रें, गई जो मेरी, लबों पे उनके,
वो  धीरे-धीरे   यूँ  मुस्कुराए,  मुझे   यक़ीं  था  के  लूट  लेंगे।

इधर  मैं सैरे चमन को निकला, उधर वो आए बहार बनकर,
हसीन  रुत  के  हसीन  साए,  मुझे  यक़ीं  था  कि लूट लेंगे।

कटार अबरू, निगाह ख़ंजर, ज़ुबान शीरीं, नशीली चितवन,
वो  अस्लहा  ऐसे  ले  के  आए, मुझे  यक़ीं था कि लूट लेंगे।

इसीलिए  धूप  अपने  सारे  बदन  पे  ओढ़े  हुए  था, 'रौनक़'
घने  दरख़्तों  के  छोटे  साए  मुझे  यकीं  था  कि  लूट  लेंगें।

- 'रोहित-रौनक़'

'ग़ज़ल' 48 बहुत तो आज भी छप्पर के ख़ाब देखते हैं।

वो और हैं जो दर-ए-ज़र के ख़ाब देखते हैं। बहुत तो आज भी छप्पर के ख़ाब देखते हैं। ये बात सच है तेरे दर के ख़ाब देखते हैं। प एहतियात से, डर डर...